शाहाबाद (हरदोई) मर्यादा और नियमों को दरकिनार कर शक्ति प्रदर्शन करने की होड़ में आज शाहाबाद की सड़कों पर कानून का इकबाल फीका नजर आया। समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने न केवल प्रशासन की अनुमति को ठेंगा दिखाया, बल्कि कोतवाली के मुख्य द्वार के सामने से नारेबाजी करते हुए पुलिस की सक्रियता को भी चुनौती दे डाली।
अव्यवस्था की ‘हुंकार’, प्रशासन का ‘मौन’
अखिलेश यादव के समर्थन में गगनभेदी नारे लगाते हुए सपाइयों का यह जत्था जब मुख्य मार्ग से गुजरा, तो राहगीर दंग रह गए। ताज्जुब की बात यह रही कि जिस मार्ग पर परिंदा भी पर नहीं मार सकता, वहां बिना किसी औपचारिक स्वीकृति के यह ‘शक्ति-जुलूस’ बदस्तूर जारी रहा। स्थानीय पुलिस का सूचना तंत्र (Intilligence) इस कदर पंगु नजर आया कि घंटों तक शहर की सड़कों पर सियासी शोर मचता रहा और जिम्मेदार महकमे को इसकी ‘कानों-कान खबर’ तक नहीं हुई।
सुर्खियों के दबाव में लौटी ‘खाकी’ की सुध
पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल तब उठे जब मीडिया की सक्रियता के बाद महकमे की नींद टूटी। जैसे ही कैमरों की फ्लैश चमकी और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर खबरें सुर्खियां बनीं, वैसे ही कोतवाली पुलिस ‘अनलॉक’ मोड में आई। घटनाक्रम का दिलचस्प पहलू यह रहा कि जो पुलिस पहले कार्यकर्ताओं के साथ ‘कदम-ताल’ करती दिख रही थी, उसने अचानक मुद्रा बदलते हुए सख्त रुख अख्तियार कर लिया और प्रदर्शनकारियों को वाहनों में भरकर थाने की राह दिखाई।
सवालिया घेरे में तंत्र
यह वाकया न केवल विपक्षी दलों की अनुशासनहीनता को दर्शाता है, बल्कि स्थानीय पुलिस की शिथिलता को भी उजागर करता है। कोतवाली के ठीक सामने से बिना अनुमति के हुजूम का गुजर जाना यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या यह पुलिस की लापरवाही थी या फिर किसी रणनीतिक चुप्पी का हिस्सा? फिलहाल, इस मामले ने जिले के गलियारों में प्रशासनिक चौकसी की पोल खोल दी है।