ब्लू स्काई, प्रधान और चौधरी ट्रेवल्स की ‘डबल डेकर’ दबंगई: क्या भ्रष्टाचार की खाद से फल-फूल रहा है यह अवैध सिंडिकेट?

इन्वेस्टिगेटिव डेस्क, शाहाबाद (हरदोई)। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार जहां एक ओर राज्य परिवहन को हाई-टेक बनाने और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन का ढोल पीट रही है, वहीं जनपद हरदोई के शाहाबाद क्षेत्र में हकीकत इसके ठीक उलट है। यहाँ परिवहन विभाग के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए ‘प्रधान ट्रेवल्स’, ‘चौधरी ट्रेवल्स’ और ‘ब्लू स्काई’ जैसे ब्रांड्स ने अपना एक ऐसा तिलस्म खड़ा कर लिया है, जिसके आगे कानून के हाथ बौने नजर आ रहे हैं। ये महज बसों के नाम नहीं हैं, बल्कि ये उस ‘नंबर दो’ के कारोबार के प्रतीक बन चुके हैं, जो सरकारी खजाने में सेंध लगाकर अपनी तिजोरियां भर रहे हैं।
डबल डेकर का ‘मायाजाल’: आँखों में धूल झोंकने का नया तरीका
हाल ही में सामने आईं तस्वीरें गवाह हैं कि किस तरह ‘प्रधान’ और ‘चौधरी’ लिखे हुए ये विशालकाय डबल डेकर वाहन सड़कों पर अपनी सत्ता चला रहे हैं। नियम कहते हैं कि यात्री बसों के लिए एक तय मानक और परमिट की आवश्यकता होती है, लेकिन इन बसों के संचालकों ने शायद ‘कानून’ को अपनी जेब में रख लिया है।
चुभता सवाल: यदि इन ‘प्रधान’ और ‘चौधरी’ नाम की बसों के पास वैध परमिट है, तो ये मुख्य बस अड्डों के बजाय शिरोमणि नगर, सवायजपुर और रूपापुर की गलियों और लिंक रोड पर क्यों छिपती फिरती हैं? इनका गंगा एक्सप्रेसवे के रास्ते दिल्ली-हरियाणा भागना ही यह साबित करता है कि दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली है।
1. राजस्व का ‘विनाश’, माफिया का ‘विकास’
परिवहन विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो हरदोई डिपो और उत्तर प्रदेश परिवहन निगम को इन अवैध बसों के कारण प्रतिदिन लाखों रुपये के राजस्व का चूना लग रहा है।
- सरकारी लूट: जो पैसा आम जनता के विकास और नई सड़कों के निर्माण में लगना चाहिए, वह पैसा सीधे इन ‘ट्रेवल्स’ संचालकों और उन्हें संरक्षण देने वाले भ्रष्ट अधिकारियों की भेंट चढ़ रहा है।
- अधिकारियों की चुप्पी: सवाल सीधे परिवहन विभाग (RTO) और स्थानीय प्रशासन पर है। आखिर क्या कारण है कि इन ‘चौधरी’ और ‘प्रधान’ ब्रांड्स की बसों पर ‘सीजिंग’ की कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रह जाती है? क्या इन संचालकों का ‘मैनेजमेंट’ इतना तगड़ा है कि साहबों की कलम इनके पहियों के आगे थम जाती है?
2. एएसपी आलोक राज नारायण की सख्ती बनाम ‘सिस्टम’ की सुस्ती

शाहाबाद क्षेत्राधिकारी का प्रभार संभाल रहे अपर पुलिस अधीक्षक आलोक राज नारायण ने मोर्चा तो संभाला है, लेकिन उनके प्रयासों को धरातल पर ‘ठेंगा’ दिखाने वालों की भी कमी नहीं है। जब एएसपी कार्रवाई के लिए निकलते हैं, तो ये बसें अंडरग्राउंड हो जाती हैं, और जैसे ही साहब का रुख मुड़ता है, ‘प्रधान’ और ‘चौधरी’ ट्रेवल्स की ये बसें फिर से दहाड़ने लगती हैं। यह चूहे-बिल्ली का खेल आखिर कब तक चलेगा? क्या प्रशासन इन माफियाओं के ‘आर्थिक तंत्र’ पर प्रहार करने की हिम्मत जुटा पाएगा?
3. नियमों का कत्लेआम: कैसे बनती हैं ये बसें?
तकनीकी रूप से इन बसों को देखना किसी डरावने सपने जैसा है:
- अवैध स्लीपर केबिन: फोटो में स्पष्ट दिख रहा है कि बस की बॉडी को अवैध रूप से मॉडिफाई कर ‘स्लीपर’ बनाया गया है। यह सुरक्षा के लिहाज से एक ‘चलता-फिरता बम’ है।
- बिना टैक्स और परमिट: अधिकांश बसें बिना वैलिड टैक्स और फिटनेस के चल रही हैं। यदि कोई बड़ा हादसा होता है, तो यात्रियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी होगी?
4. ग्राम सभाओं से दिल्ली तक का ‘अवैध रूट’
इन ट्रेवल्स संचालकों ने बड़े-बड़े ग्राम सभाओं को अपना ‘अड्डा’ बना लिया है। यहाँ से सवारी भरकर ये बसें सीधे दिल्ली और हरियाणा जैसे राज्यों के लिए निकलती हैं।
ग्राउंड रिपोर्ट: सूत्रों की मानें तो इन बसों के संचालन में एक पूरा ‘कैश-फ्लो’ चेन काम करता है। नीचे से लेकर ऊपर तक ‘महीना’ तय है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भ्रष्टाचार विरोधी लड़ाई को उनके ही निचले स्तर के अधिकारी ठेंगा दिखा रहे हैं। जहाँ मुख्यमंत्री ‘सबका साथ-सबका विकास’ की बात करते हैं, वहीं अधिकारी ‘अपने विकास’ के लिए सरकारी खजाने को नीलाम कर रहे हैं।
इन्वेस्टिगेटिव विजुअल: खबर की ‘मिर्ची’ उन जिम्मेदारों के लिए जो सो रहे हैं!
खबर में प्रयुक्त तस्वीरें किसी सबूत की मोहताज नहीं हैं। ‘BLUE SKY’ हो या ‘प्रधान’, इनकी चमकती बॉडी के पीछे भ्रष्टाचार की काली स्याही छिपी है। मुख्यमंत्री योगी जी, आपके सपनों के ‘भ्रष्टाचार मुक्त उत्तर प्रदेश’ को हरदोई के ये ‘चौधरी’ और ‘प्रधान’ ट्रेवल्स वाले माफिया मिलकर रौंद रहे हैं।
शाहाबाद की जनता का सवाल:
- क्या जिलाधिकारी अनुनय झा इन ट्रेवल्स संचालकों के खिलाफ ‘बुलडोजर’ जैसी कार्रवाई की हिम्मत दिखाएंगे?
- क्या परिवहन विभाग के उन बाबुओं और अफसरों की संपत्ति की जांच होगी जिनके कार्यकाल में यह साम्राज्य फला-फूला?
- आखिर कब तक ‘प्रधान’ और ‘चौधरी’ के नाम पर कानून का मजाक उड़ाया जाता रहेगा?
अब ‘दिखावा’ नहीं, ‘दबाव’ चाहिए
शाहाबाद में डग्गामार बसों का यह मुद्दा अब केवल ट्रैफिक का विषय नहीं रहा। यह प्रशासन की साख और सरकार की नीयत का सवाल बन चुका है। जनता अब केवल ‘कागजी चालान’ नहीं देखना चाहती, बल्कि ऐसी कठोर कार्रवाई चाहती है कि ये ‘डबल डेकर’ बसें कबाड़ में तब्दील हो जाएं और इनके मालिक फिर कभी कानून से खेलने की जुर्रत न करें।
याद रहे, उत्तर प्रदेश में कानून का राज है, किसी ‘ट्रेवल्स माफिया’ का नहीं। यदि अधिकारी अब भी नहीं जागे, तो यह ‘मिर्ची’ केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसकी गूंज लखनऊ के गलियारों तक पहुंचेगी।