विशेष पड़ताल: विकास के दावों की उड़ती धज्जियां तारागांव पंचायत: ‘मेकअप’ से ढकी बदहाली, क्या कागजों में ही चमक रहा विकास?

सचिवालय में ‘कुर्सी ऑन व्हील्स’ मॉडल; सामुदायिक शौचालय बना गंदगी का टापू

– ब्यूरो रिपोर्ट, अवध 24 हर्षदीप मिश्रा

टोडरपुर, हरदोई — विकास खंड: टोडरपुर (ब्यूरो) जनपद के विकास खंड टोडरपुर की ग्राम पंचायत तारागांव इन दिनों सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा रही है। जमीनी हकीकत की पड़ताल में यह साफ हो गया है कि यहाँ विकास की इबारत दीवारों पर पुते रंग-रोगन तक ही सीमित है। शासन की महत्वपूर्ण योजनाओं को यहाँ का सिस्टम ‘शर्मसार’ करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है।
दिखावे का ‘स्वच्छ भारत’: शौचालय की हालत देख रूह कांप जाए
तारागांव का सामुदायिक शौचालय ‘सुविधा’ के नाम पर ग्रामीणों के लिए ‘सजा’ बन चुका है। बाहर की दीवारों पर चटक पेंट कर सरकारी धन की इतिश्री तो कर दी गई, लेकिन भीतर कदम रखते ही बदबू और गंदगी का अंबार स्वागत करता है।


* धरातल की स्थिति: टूटी हुई सीटें, उखड़े हुए दरवाजे और पानी की अनुपलब्धता यह बताने के लिए पर्याप्त है कि मेंटेनेंस बजट आखिर कहाँ जा रहा है।


* सफाई का संकट: नियमित सफाई का कोई रिकॉर्ड न होना यह दर्शाता है कि ‘स्वच्छ भारत मिशन’ यहाँ सिर्फ कागजी घोड़ों तक सीमित है।


अजब सचिवालय की गजब कहानी: साहब लाते हैं अपनी कुर्सी!
गांव की सरकार जहाँ से चलती है, उस सचिवालय की स्थिति किसी वीरान खंडहर से कम नहीं है। फर्श टूटा हुआ है, प्लास्टर झड़ रहा है और बिजली की वायरिंग केवल दीवारों पर लटक रही है।


> व्यंग्यपूर्ण वास्तविकता: हद तो तब हो गई जब यह पता चला कि यहाँ सचिव साहब का कोई निश्चित बैठने का स्थान नहीं है। प्रधान प्रतिनिधि के अनुसार, सचिव साहब अपनी कुर्सी साथ लेकर आते हैं और काम खत्म कर वापस ले जाते हैं। इसे ग्रामीण ‘कुर्सी ऑन व्हील्स’ मॉडल कह रहे हैं। सचिवालय में न तो पंखे हैं और न ही दस्तावेजों के रखरखाव का कोई सिस्टम।

>जिम्मेदारी का ‘पिंग-पोंग’: सच और झूठ के बीच उलझा तंत्र
जब इस बदहाली पर जवाबदेही की बात आई, तो अधिकारियों और प्रतिनिधियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो गया है।

* प्रधान का पक्ष: उनका दावा है कि बीडीओ (BDO) टोडरपुर को लिखित शिकायत दी जा चुकी है।

* अधिकारी का पक्ष: बीडीओ का कहना है कि उन्हें ऐसी किसी समस्या की जानकारी ही नहीं है।
सवाल यह है कि अगर शिकायत हुई है तो कार्रवाई क्यों नहीं? और अगर जानकारी नहीं है, तो ब्लॉक स्तर के अधिकारी क्या सिर्फ दफ्तरों की ठंडी हवा खाने के लिए तैनात हैं?
गंभीर सवाल जो जवाब मांगते हैं:

* बजट का बंदरबांट: 15वें वित्त आयोग और स्वच्छ भारत मिशन का फंड आखिर किस ‘विकास’ पर खर्च हुआ?

* जवाबदेही किसकी: पंचायत सहायक और सचिव की उपस्थिति रजिस्टर में दर्ज है या वे भी कागजों में ही सक्रिय हैं?

* जीरो टॉलरेंस का दावा: सरकार के भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन के दावे को तारागांव का सिस्टम सरेआम चुनौती क्यों दे रहा है?


तारागांव की यह तस्वीर केवल एक पंचायत की नहीं, बल्कि उस लचर प्रशासनिक ढांचे की है जहाँ दीवारों को पोत कर ‘ऑल इज वेल’ दिखाने की कोशिश की जाती है। अब देखना यह होगा कि जनपद के उच्चाधिकारी इस ‘साजिशन लापरवाही’ पर कब संज्ञान लेते हैं या फिर यह मुद्दा भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगा।