
हरदोई पुकार | जिला संवाददाता अवधेश कुमार
जमुरा, टोडरपुर हरदोई — उत्तर प्रदेश सरकार भले ही प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ और जनसुलभ बनाने के बड़े-बड़े दावे कर रही हो, लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों को आईना दिखाती नजर आ रही है। खास बात यह है कि यह मामला किसी सामान्य जनपद का नहीं, बल्कि प्रदेश के उपमुख्यमंत्री व स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक के गृह जनपद हरदोई का है, जहां स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति स्वयं सरकार की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रही है।
शाहाबाद तहसील क्षेत्र के टोडरपुर ब्लॉक अंतर्गत स्थित जमुरा उप स्वास्थ्य केंद्र इन दिनों बदहाली और अव्यवस्था की जीवंत मिसाल बना हुआ है। पत्रकारों की टीम द्वारा किए गए स्थलीय निरीक्षण में जो तस्वीर सामने आई, वह बेहद चिंताजनक और चौंकाने वाली थी। उपकेंद्र का मुख्य गेट बंद मिला, जिस पर जंग लगा ताला लटक रहा था। यह दृश्य साफ संकेत देता है कि यहां स्वास्थ्य सेवाएं नियमित रूप से संचालित नहीं हो रहीं, बल्कि केवल कागजों तक ही सीमित हैं।
केंद्र परिसर में प्रवेश करने पर हालात और भी बदतर नजर आए। भवन के अंदर कमरों पर भी ताले लटके मिले और चारों ओर सन्नाटा पसरा हुआ था। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो यह कोई सक्रिय स्वास्थ्य केंद्र नहीं, बल्कि वर्षों से बंद पड़ी परित्यक्त इमारत हो। परिसर में साफ-सफाई का अभाव साफ दिखाई दिया। शौचालय का टैंक खुला पड़ा था, जिसके आसपास गंदगी फैली हुई थी। बिजली व्यवस्था भी पूरी तरह नदारद मिली, जिससे यह सवाल उठता है कि बिना मूलभूत सुविधाओं के आखिर स्वास्थ्य सेवाएं कैसे संचालित की जा रही होंगी।
स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि उपकेंद्र पर महीनों से कोई चिकित्सक या स्वास्थ्यकर्मी नियमित रूप से नहीं आ रहा है। ग्रामीणों को छोटी से छोटी बीमारी के इलाज के लिए भी कई किलोमीटर दूर अन्य स्वास्थ्य केंद्रों का सहारा लेना पड़ता है। इससे न केवल समय की बर्बादी होती है, बल्कि आर्थिक बोझ भी बढ़ता है। आपातकालीन स्थिति में यह समस्या और भी गंभीर रूप ले लेती है, जिससे ग्रामीणों में आक्रोश व्याप्त है।
जब इस मामले में मुख्य चिकित्सा अधिकारी भाव नाथ पांडे से बातचीत की गई, तो उन्होंने बताया कि उप स्वास्थ्य केंद्र का हैंडओवर अभी तक पंचायती राज विभाग को नहीं किया गया है, जिसके कारण संचालन को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। वहीं, टोडरपुर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के प्रभारी एम.पी. जायसवाल ने दावा किया कि उपकेंद्र प्रतिदिन खुलता है और वहां चिकित्सक की ड्यूटी भी निर्धारित है।
हालांकि, जमीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल विपरीत दिखाई दी। बंद गेट, जंग लगे ताले और गंदगी से भरा परिसर यह स्पष्ट दर्शाता है कि यहां स्वास्थ्य सेवाएं केवल कागजी दावों तक सीमित हैं। यह स्थिति न केवल स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ी करती है, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था की पोल भी खोलती है।
गौरतलब है कि यह पहला मौका नहीं है जब जमुरा उप स्वास्थ्य केंद्र की बदहाली सामने आई हो। इससे पहले भी इस केंद्र की स्थिति को लेकर खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिसके बाद कुछ समय के लिए साफ-सफाई कराई गई थी, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकाला गया। परिणामस्वरूप, स्थिति फिर से जस की तस हो गई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब स्वास्थ्य मंत्री का अपना गृह जनपद ही इस तरह की अव्यवस्थाओं से जूझ रहा है, तो प्रदेश के दूर-दराज इलाकों की स्थिति क्या होगी? क्या सरकार के दावे केवल प्रचार तक सीमित हैं, या फिर जमीनी स्तर पर भी सुधार की कोई ठोस रणनीति मौजूद है?
अब देखना यह होगा कि इस पूरे मामले में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होती है या नहीं। क्या लापरवाही पर कोई कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा। फिलहाल, जमुरा उप स्वास्थ्य केंद्र की स्थिति प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था की सच्चाई बयां कर रही है, जो किसी भी सूरत में नजरअंदाज नहीं की जा