
हरदोई। जनपद से दिल्ली, फरीदाबाद, गुड़गांव और जयपुर की ओर दौड़ रही डबल डेकर बसों ने नियम-कानून को मजाक बनाकर रख दिया है और शासन-प्रशासन की आंखों में धूल झोंकते हुए रोजाना सरकार को लाखों का चूना लगा रही हैं। परमिट की शर्त साफ कहती है कि बस एक निर्धारित स्थान से पार्टी बुकिंग लेकर गंतव्य तक जाएगी, लेकिन हकीकत यह है कि ये बसें शहर के चौराहों, ढाबों, कस्बों और गांवों तक से सवारियां भरती हैं, बीच रास्ते किराया वसूलती हैं और बिना टिकट, बिना रसीद खुलेआम नकद लेनदेन करती हैं। क्षमता 50 की, सवारियां 80 से ऊपर—क्या परिवहन विभाग को यह दिखाई नहीं देता या फिर आंखें जानबूझकर बंद कर ली गई हैं? कई बसों के परमिट संदिग्ध बताए जा रहे हैं, कुछ के पास वैध कागजात तक नहीं, फिर भी वे बेखौफ सड़कों पर दौड़ रही हैं। सवाल सीधा है—जब एक आम वाहन चालक से हेलमेट या कागज की कमी पर हजारों का चालान काट लिया जाता है तो इन बस मालिकों पर मेहरबानी क्यों? क्या एआरटीओ कार्यालय, चेकपोस्ट और संबंधित थाने केवल छोटे वाहन चालकों पर कार्रवाई के लिए बने हैं? ओवरलोडिंग से दुर्घटना का खतरा हर पल बना रहता है, लेकिन लगता है प्रशासन किसी बड़े हादसे के बाद ही जागेगा। आरोप तो यहां तक हैं कि इन बसों के जरिये बिना टैक्स का माल और पार्सल भी एक शहर से दूसरे शहर तक पहुंचाया जा रहा है, जिससे सरकार को दोहरी मार—राजस्व हानि और सुरक्षा जोखिम—झेलनी पड़ रही है। आखिर यह सब किसके संरक्षण में चल रहा है? क्या संबंधित विभागों की मिलीभगत के बिना इतना बड़ा खेल संभव है? जनपद की जनता पूछ रही है कि अगर नियम सिर्फ आम आदमी के लिए हैं तो फिर इन डबल डेकर बसों को किसने खुली छूट दे रखी है? सरकार सख्ती के दावे करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात इसके उलट हैं। जरूरत है तत्काल विशेष जांच अभियान की, हर बस के परमिट, फिटनेस, टैक्स और यात्री सूची की कड़ी जांच की, अवैध संचालन पर सीधी एफआईआर की और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की। वरना यह साफ समझा जाएगा कि राजस्व लूट का यह खेल विभागीय संरक्षण में चल रहा है। अब फैसला प्रशासन को करना है—कार्रवाई करेगा या फिर मूकदर्शक बनकर सरकार को लग रहे इस खुले चूने पर चुप्पी साधे रहेगा।